लखनऊ। जिला पंचायत बोर्ड की हालिया बैठक का एक वीडियो सामने आने के बाद स्थानीय राजनीति में भूचाल आ गया है। बैठक के दौरान सत्ता और प्रशासन के बीच टकराव, आरोप-प्रत्यारोप और भ्रष्टाचार के गंभीर संकेत साफ दिखाई दे रहे हैं। वीडियो में अपर मुख्याधिकारी यह कहते नजर आ रहे हैं कि कुछ जिला पंचायत सदस्यों को उनसे इसलिए आपत्ति है क्योंकि “उनकी प्रॉपर्टी की साइटें चल रही हैं” और इसी कारण वे व्यक्तिगत रूप से उन पर आरोप लगा रहे हैं।
यह बयान अपने आप में इस बात की ओर इशारा करता है कि जिले में राजनीति अब जनसेवा नहीं बल्कि ठेकेदारी और रियल एस्टेट के हित साधने का माध्यम बनती जा रही है। बैठक के दौरान कई निर्वाचित सदस्यों ने अपर मुख्याधिकारी पर रिश्वतखोरी और मनमानी के आरोप लगाए। सदस्यों का कहना था कि उनकी कोई सुनवाई नहीं होती, विकास कार्यों की फाइलें जानबूझकर रोकी जाती हैं और बिना लेन-देन के काम आगे नहीं बढ़ता।
वहीं दूसरी ओर, अपर मुख्याधिकारी ने भी सदस्यों पर पलटवार करते हुए कहा कि कुछ नेता अपने निजी स्वार्थों और जमीन-जायदाद के कारोबार के लिए दबाव बनाते हैं। जब नियम-कानून के अनुसार काम होता है तो वही लोग भ्रष्टाचार के आरोप लगाने लगते हैं।
इस पूरे घटनाक्रम ने जिला पंचायत की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जनता जिन प्रतिनिधियों को विकास और पारदर्शिता के लिए चुनती है, वही अगर आपसी लड़ाई, साइटों और ठेकों के खेल में उलझे हों तो जनहित का क्या होगा? बैठक में हुआ हंगामा यह दर्शाता है कि जिले में विकास की योजनाओं से ज्यादा अहमियत व्यक्तिगत फायदे और राजनीतिक रसूख को दी जा रही है।
अब सवाल यह है कि इतने गंभीर आरोपों के बाद भी क्या जिम्मेदार नेताओं और अधिकारियों पर कोई ठोस कार्रवाई होगी, या फिर यह मामला भी अन्य विवादों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा। जनता जवाब चाहती है कि राजनीति कब तक ठेकेदारी और भ्रष्टाचार का माध्यम बनी रहेगी।






