लखनऊ
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में एक राज्य मान्यता प्राप्त पत्रकार पर हुए जानलेवा हमले ने न सिर्फ पत्रकारिता जगत को हिला दिया है, बल्कि सिस्टम व कार्यप्रणाली पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। घटना के बाद शहर से लेकर राज्य स्तर तक हलचल मचनी चाहिए थी, लेकिन मामले को धीरे-धीरे ऐसे दबा दिया गया जैसे कुछ हुआ ही न हो।
लखनऊ में पत्रकार को बीते दिनों बुरी तरह पीटा गया, हालत इतनी गंभीर थी कि वह अधमरा हो गया। इसके बावजूद कार्रवाई की रफ्तार बेहद धीमी रही। घटना के बाद कई बड़ी हस्तियाँ अस्पताल पहुँचीं, मुलाकातें हुईं, तस्वीरें खिंचीं और बयान जारी हुए,परन्तु न्याय की दिशा में कोई ठोस कदम अब तक नज़र नहीं आया।
पत्रकारों का विरोध, पाँच घंटे तक धरना—लेकिन कोई असर नहीं
लंबे समय बाद राज्यभर के पत्रकार सड़क पर उतरे।
लखनऊ में घंटों तक धरना और विरोध प्रदर्शन हुआ।
करीब 5 घंटे तक पत्रकारों ने राजधानी की सड़कों पर डटे रहकर कार्रवाई की मांग की।
लेकिन यह विरोध भी सिस्टम को झकझोर नहीं पाया।
प्रशासन की प्रतिक्रिया लगभग नगण्य रही।
हमला सिर्फ सुशील अवस्थी पर नहीं, ‘पत्रकारिता’ पर था–संगठन
पत्रकारों ने कहा कि यह हमला केवल सुशील अवस्थी पर नहीं था,
बल्कि हर उस कलम पर था
जो सच लिखने की हिम्मत रखती है।
यह हमला हर उस चेहरे पर था
जो सत्ता, समाज, भ्रष्टाचार या अपराध के खिलाफ आवाज उठाता है।
‘साधारण अपराधी नहीं लगते हमलावर’पुलिस पर उठे सवाल
पत्रकार संगठनों ने इस बात पर भी सवाल उठाए कि
यदि मामला किसी जेबकतरे, राहजनी या सामान्य अपराधी का होता,
तो पुलिस अगले ही दिन उसे कैमरों के सामने पेश कर देती।
लेकिन इस मामले में न गिरफ्तारी तेज हुई,
न कोई ठोस खुलासा सामने आया।
हमलावरों की चाल, उनका आत्मविश्वास और घटना की योजना देखकर
पत्रकारों का आरोप है कि—
“यह साधारण अपराधियों का काम नहीं हो सकता। इनके पीछे किसी बड़े हाथ की भूमिका से इनकार नहीं किया जा सकता।”
लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा हमला?
राजधानी में राज्य मान्यता प्राप्त पत्रकार पर हमला
सिर्फ एक आपराधिक घटना नहीं
बल्कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधी चोट मानी जा रही है।
विशेषज्ञों का कहना है कि
यदि पत्रकार सुरक्षित नहीं,
और पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर कड़े नियम लागू किए जाएँ।
जब तक न्याय नहीं मिलता, कई संगठन आंदोलन जारी रखने की चेतावनी दे चुके हैं।



