वाराणसी
शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत के तीन बच्चे पैदा करने संबंधी बयान पर तीखी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा कि जो व्यक्ति स्वयं विवाह और गृहस्थ जीवन में नहीं है, उसे इस विषय पर दूसरों को सलाह देने से पहले अपने आचरण पर विचार करना चाहिए।
शंकराचार्य ने तर्क दिया कि गृहस्थ जीवन की जिम्मेदारियों और बच्चों के पालन-पोषण की वास्तविक चुनौतियों को वही समझ सकता है, जो स्वयं इस प्रक्रिया का हिस्सा रहा हो। उन्होंने कहा कि संवेदनशील विषयों पर टिप्पणी करते समय अनुभव और नैतिक अधिकार दोनों आवश्यक हैं। केवल संख्या बढ़ाने से समाज की वास्तविक शक्ति नहीं बढ़ती, बल्कि उसकी संस्कृति, सभ्यता और धर्म के प्रति सजगता ही उसे मजबूत बनाती है।
उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि इस प्रकार के बयान राजनीतिक लाभ और समाज में ध्रुवीकरण की मंशा से दिए जाते हैं। आम लोग अपनी आर्थिक क्षमता और बच्चों के बेहतर भविष्य को ध्यान में रखकर ही परिवार बढ़ाने का निर्णय लेते हैं। ऐसे में अविवाहित लोगों द्वारा इस तरह की नसीहतें भ्रम पैदा करती हैं।
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद ने कहा कि बिना संस्कारों के केवल संख्या बढ़ाना धर्मशास्त्रों की भावना के विपरीत है। यदि बच्चों में सही संस्कार न हों, तो भविष्य में उनके धर्म और मूल्यों पर खतरा उत्पन्न हो सकता है। उन्होंने चेताया कि “फसल हम उगाएं और काटे कोई और” जैसी स्थिति नहीं बननी चाहिए।
अंत में उन्होंने कहा कि किसी परिवार को कितने बच्चे होने चाहिए, यह निर्णय पूरी तरह माता-पिता के विवेक पर छोड़ देना चाहिए। धर्म और समाज की रक्षा संख्या से नहीं, बल्कि व्यक्ति के चरित्र, संस्कार और अडिग विश्वास से होती है।





