देहरादून
उत्तराखंड सरकार का ताज़ा आदेश शिक्षा व्यवस्था की प्राथमिकताओं पर गंभीर सवाल खड़े करता है। सरकारी और गैर-सरकारी डिग्री कॉलेजों के प्राचार्यों, प्रोफेसरों और विश्वविद्यालयों के कुलसचिवों को लावारिस कुत्तों की गिनती और उनके पुनर्वास की निगरानी का जिम्मा देना न सिर्फ अव्यावहारिक है, बल्कि शिक्षकों के पेशेवर सम्मान पर भी सीधा प्रहार है।
राज्य में आवारा कुत्तों की समस्या निस्संदेह गंभीर है और इससे निपटने के लिए ठोस नीति, स्थानीय निकायों की सक्रियता और पशु कल्याण विभाग की जवाबदेही जरूरी है। लेकिन इस प्रशासनिक विफलता का बोझ शिक्षा जगत पर डालना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि जिम्मेदारी से पलायन प्रतीत होता है।
शिक्षकों का मूल दायित्व अध्यापन, शोध और विद्यार्थियों के भविष्य निर्माण से जुड़ा है। उन्हें कुत्तों की गिनती जैसे कार्यों में लगाना शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकता है। अखिल भारतीय राष्ट्रीय शैक्षिक महासंघ सहित कई शिक्षक संगठनों की आपत्ति इस असंतोष को स्पष्ट करती है।
सरकार का यह तर्क कि आदेश “प्रशासनिक समन्वय” के लिए है, कमजोर लगता है। यदि समन्वय ही उद्देश्य था, तो नगर निकायों, ग्राम पंचायतों और पशुपालन विभाग को सशक्त क्यों नहीं किया गया? यह फैसला दर्शाता है कि समस्या के मूल कारणों को संबोधित करने के बजाय सरकार तात्कालिक और विवादास्पद उपायों का सहारा ले रही है।





