अलीगढ़ से शार्पदृष्टि की रिपोर्ट
तीन साल बीत गए,पर अतरौली की 15 वर्षीय मूकबधिर और नेत्रहीन किशोरी के लिए इंसाफ अब भी अंधेरे में है।12 सितंबर 2022 की सुबह गांव की यह मासूम शौच के लिए निकली थी,जब कासिमपुर थाना क्षेत्र के नंदाखेड़ा निवासी नरेश कश्यप ने उसे खेत में खींचकर दुष्कर्म किया।पुलिस ने रिपोर्ट तो दर्ज कर ली,आरोपी भी पकड़ा गया, लेकिन मामला यहीं ठहर गया क्योंकि पीड़िता के बयान अब तक नहीं हो पाए ।मूकबधिर और नेत्रहीन किशोरी के न तो धारा 161 CrPC (पुलिस के सामने) और न ही 164 CrPC (न्यायालय के समक्ष) बयान हो पाए। आरोपी जेल में है, मगर केस की जड़ वहीं थमी है जहाँ पीड़िता की “आवाज़” शुरू ही नहीं हो सकी। सुनवाई केवल परिस्थितिजन्य साक्ष्य और गवाहों के आधार पर चल रही है।
15 गवाहों में से 6 की गवाही हो चुकी है, लेकिन सबसे अहम — पीड़िता की — अब भी अधूरी है।
—जब देश के हर संस्थान ने कह दिया — “हम असमर्थ हैं” :-
इस एक बयान के लिए पुलिस और अदालत ने देश के दर्जन भर से
ज्यादा संस्थानों के दरवाज़े खटखटाए
बीएसए द्वारा भेजी गई प्रशिक्षक क्षमा मिश्रा ने कहा कि वे केवल उन मूकबधिरों का बयान करा सकती हैं जिन्हें दिखाई देता हो।
एटा, लखनऊ, देहरादून और चेन्नई तक के विशेषज्ञों ने कोशिश की, पर कोई भी भाषा नहीं समझ सका।
राष्ट्रीय बहु दिव्यांगता जन सशक्तिकरण संस्थान, चेन्नई ने अंततः कहा — “ऐसे बहु-दिव्यांग व्यक्तियों की भाषा समझने वाला प्रशिक्षित विशेषज्ञ ही मदद कर सकता है।”
तीन साल बीत गए, लेकिन न राज्य में, न देश में ऐसा कोई प्रशिक्षक मिला जो इस बच्ची की “खामोश गवाही” अदालत तक पहुँचा सके।
व्यवस्था की बेबसी और कानून की चुप्पी
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कानून कहता है — हर पीड़िता को अपनी बात कहने का अधिकार है। लेकिन जब पीड़िता न बोल सकती है, न देख सकती है, न सुन सकती है, तब कानून भी मौन हो जाता है। पुलिस ने पत्रों का ढेर लगाया —
बेसिक शिक्षा निदेशक से लेकर दिव्यांगजन सशक्तीकरण विभाग तक — हर जगह से जवाब आया, “अक्षम हैं, असमर्थ हैं।”
फाइलें घूमती रहीं, पर इंसाफ वहीं ठहर गया जहाँ से सफर शुरू हुआ था।
पिता की व्यथा — “बेटी की खामोशी से बड़ा अपराध तंत्र की चुप्पी है
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“तीन साल हो गए। अगर कोई मेरी बेटी की भाषा नहीं समझ सकता तो फिर ये सिस्टम किसके लिए बना है?
अदालतें हैं, पुलिस है, कागज़ हैं — पर आवाज़ नहीं है।”
— पीड़िता के पिता, अतरौली
सवाल सिर्फ एक — क्या खामोशी का कोई अनुवाद नहीं?
भारत में दिव्यांगता अधिकार अधिनियम (RPwD Act) 2016 के तहत हर प्रकार की दिव्यांगता के लिए समान न्याय और सहायक व्यवस्था की बात की गई है। मगर यह केस उस अधिनियम की सबसे बड़ी परीक्षा बन गया —
तीन साल में न तकनीक मिली, न प्रशिक्षक, न कोई तरीका जिससे यह बच्ची अपने साथ हुए अन्याय को कह सके।
पुलिस और सिस्टम के लिए एक आईना
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क्या हमारे जांच तंत्र में ऐसी व्यवस्था नहीं बननी चाहिए जो बहु-दिव्यांग पीड़ितों की भाषा और संकेतों को समझ सके? क्या हर ज़िले में ऐसे प्रशिक्षित दुभाषिए की व्यवस्था नहीं होनी चाहिए जो कानून और मानवता के बीच पुल बन सके? अगर नहीं, तो क्या यह हमारे न्याय की सबसे बड़ी विफलता नहीं है?
यह कहानी सिर्फ एक किशोरी की नहीं — यह कहानी उस सिस्टम की है जो सुनना चाहता है, पर सुन नहीं पाता। देखना चाहता है, पर देख नहीं पाता।
और शायद इसलिए — तीन साल बाद भी अदालत में सन्नाटा ही सबसे बड़ा बयान है।




