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प्रेमानंद महाराज के खिलाफ साजिश या हर घटना को आश्रम से जोड़ने की जल्दबाजी?  

 

मथुरा

वृंदावन के संत प्रेमानंद जी महाराज और उनके आश्रम से जुड़ी कुछ घटनाओं को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं। कैलीकुंज में रसिक दुलारी की कथित आत्महत्या हो या 16 वर्षीय अनुज चौधरी और नोएडा की विभा सिंह के लापता होने का मामला—हर घटना में किसी न किसी स्तर पर प्रेमानंद महाराज या उनके आश्रम का नाम सामने आ रहा है। हालांकि, इन मामलों में आश्रम की भूमिका को लेकर अभी ठोस तथ्य सामने आना बाकी है।

कैलीकुंज में रसिक दुलारी की कथित आत्महत्या के समय प्रेमानंद महाराज वहां मौजूद नहीं थे। पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज सामने आने की बात कही, लेकिन घटना की पूरी पृष्ठभूमि और आश्रम से जुड़े लोगों के बीच कथित विवाद को लेकर कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। यह भी स्पष्ट किया जाना जरूरी है कि प्रेमानंद महाराज ने कैलीकुंज क्यों छोड़ा था और उसका इस घटना से कोई संबंध था या नहीं।

इसी तरह 16 वर्षीय अनुज चौधरी के करीब तीन महीने से लापता होने का मामला है। परिवार का कहना है कि वह प्रेमानंद महाराज से दीक्षा लेने के लिए आया था। आश्रम की ओर से नाबालिग को परिवार की अनुमति के बिना दीक्षा नहीं देने की बात कही गई है। ऐसे में पुलिस जांच का अहम पहलू यह भी होना चाहिए कि किशोर आश्रम तक कैसे पहुंचा और उसके बाद उसके साथ क्या हुआ।

नोएडा की 35 वर्षीय विभा सिंह 15 अगस्त से लापता हैं। परिवार के अनुसार वह प्रेमानंद महाराज के आश्रम गई थीं। फिलहाल आश्रम का नाम सामने आना और किसी घटना में उसकी भूमिका साबित होना दो अलग-अलग बातें हैं। उनकी तलाश करना पुलिस और परिवार की जिम्मेदारी है और जांच के निष्कर्ष से ही स्थिति स्पष्ट होगी।

वृंदावन के श्रीबांकेबिहारी मंदिर में देश-विदेश से हजारों श्रद्धालु आते हैं। भीड़भाड़ वाले धार्मिक स्थलों पर लोगों के गुम होने की घटनाएं सामने आती रही हैं। ऐसे में किसी व्यक्ति के किसी धार्मिक स्थल पर जाने भर से वहां की संस्था या संत को उसके बाद की हर घटना के लिए जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा।

संतों की छवि को अतीत में सामने आए कई विवादित मामलों से नुकसान पहुंचा है। लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि हर संत या धार्मिक संस्था को उन्हीं घटनाओं के चश्मे से देखा जाए। किसी भी आरोप की पुष्टि जांच और प्रमाण के आधार पर होनी चाहिए। प्रेमानंद महाराज के आश्रम से जुड़े मामलों में भी यही कसौटी लागू होनी चाहिए—न तो बिना जांच के किसी को दोषी ठहराया जाए और न ही किसी संभावित अपराध की जांच केवल धार्मिक प्रतिष्ठा के कारण प्रभावित हो।

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