अहमदाबाद
गुजरात हाईकोर्ट में एक अहम सुनवाई के दौरान पारदर्शिता और नागरिक अधिकारों को लेकर बड़ी टिप्पणी सामने आई। अदालत ने स्पष्ट किया कि थाने के भीतर वीडियो रिकॉर्डिंग या फोटोग्राफी करना कोई अपराध नहीं है, बल्कि यह नागरिकों का अधिकार है।
माननीय निरजर एस. देसाई की अदालत में सुनवाई के दौरान पुलिस पक्ष की महिला अधिवक्ता ने दलील दी कि आम नागरिक थाने के अंदर वीडियो या फोटो नहीं ले सकते। इस पर न्यायाधीश ने सख्त रुख अपनाते हुए पूछा कि आखिर किस कानून के तहत इस पर प्रतिबंध लगाया गया है।
यह मामला हिरासत में यातना के आरोपों से जुड़ा था। पुलिस ने अपने बचाव में कहा कि शिकायतकर्ता घटना की वीडियो रिकॉर्डिंग कर रहे थे। अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि यदि पुलिस अपना काम कानून के अनुसार कर रही है, तो रिकॉर्डिंग से उसे कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।
सुनवाई के दौरान अदालत ने राज्य में CCTV कैमरों की स्थिति पर भी सवाल उठाए। न्यायाधीश ने कहा कि जब 80 प्रतिशत CCTV कैमरे ही काम नहीं कर रहे हैं, तो नागरिकों को रिकॉर्डिंग से रोकने का तर्क कैसे सही ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि CCTV का हवाला तभी मान्य होगा जब सभी कैमरे सही तरीके से काम कर रहे हों।
अदालत ने साफ कहा कि थाना एक सार्वजनिक स्थान है और यहां शांतिपूर्वक, बिना किसी सरकारी कार्य में बाधा डाले, वीडियो या फोटो लेना कानूनन गलत नहीं है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि ऐसे मामलों में Official Secrets Act लागू नहीं होता। यह टिप्पणी न केवल इस मामले में महत्वपूर्ण रही, बल्कि देशभर में नागरिक अधिकारों और पुलिस जवाबदेही को लेकर एक मजबूत संदेश भी बनकर उभरी है। सोशल मीडिया पर इस सुनवाई की चर्चा के बाद बड़ी संख्या में लोगों ने अदालत की सराहना की। अदालत की यह टिप्पणी नागरिकों को जागरूक करने के साथ-साथ यह भी याद दिलाती है कि अपने अधिकारों को जानना और उनका सही तरीके से उपयोग करना लोकतंत्र को मजबूत बनाता है।




