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अब नहीं रहे हिंदी साहित्य के शताब्दी पुरुष पद्मश्री 101 वर्षीय प्रो.रामदरश मिश्

 

 

शार्पदृष्टि की रिपोर्ट 

प्रोफेसर रामदरस मिश्र का 31 अक्टूबर को अवसान हो गया। वे सक्रिय जीवन जीते हुए 101 वर्ष की आयु पूर्ण करने वाले ऐसे विरल साहित्य के योद्धा थे,जिन्होंने अपनी लंबी साहित्यिक यात्रा बिना किसी गुटबाजी के अपने बदौलत सम्मानजनक ढंग से लंबी जीवन यात्रा पूरी की।1924 में गोरखपुर (उ.प्र.) के कछार के डुमरी गांव में जन्मे डॉ. रामदरश की रचनाओं में उनके गांव की सुगंधित मिट्टी की महक बसी है।इन्होने उच्च शिक्षा बनारस से पूर्ण करने के बाद महाराष्ट्र, गुजरात के विश्व विद्यालयों से होते हुए 1964 में दिल्ली विश्व विद्यालय में प्रोफेसर हुए और वहीं बस गए।हिंदी साहित्य में कवि , कथाकार,उपन्यासकार,संस्मरण लेखक और समालोचक के रूप में प्रसिद्धि प्राप्त करने वाले प्रो.मिश्र अनेक प्रतिष्ठित सम्मान और पुरस्कारों से नवाजे गए।जनवरी 1925 में उन्हें भारत सरकार ने पद्मश्री सम्मान प्रदान किया।डॉ. मिश्र अत्यंत सहृदय, सरल हृदय के संवेदनशील और स्वाभिमानी व्यक्ति थे।अनेको नवोदित साहित्यकारों के लिए वे लोगो के प्रेरणा स्रोत रहे।

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