प्रयागराज
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा है कि यदि दो बालिगों के बीच लंबे समय तक आपसी सहमति से शारीरिक संबंध रहे हों, तो केवल शादी का वादा पूरा न होने के आधार पर हर मामले को दुष्कर्म नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि यदि विवाद का मूल स्वरूप आर्थिक या सिविल प्रकृति का हो, तो उसे रेप का मामला नहीं बनाया जा सकता।
न्यायमूर्ति संतोष राय की एकलपीठ ने आरोपी सौरभ पाल सिंह की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए उसे आईपीसी की धारा 376, 420, 406, 504, 506 तथा एससी/एसटी एक्ट की धारा 3(2)(v) के आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने प्रयागराज की विशेष अदालत द्वारा आरोप तय करने और डिस्चार्ज अर्जी खारिज करने के आदेश को भी निरस्त कर दिया।
मामले में इलाहाबाद विश्वविद्यालय की एक छात्रा ने आरोप लगाया था कि आरोपी ने शादी का आश्वासन देकर लंबे समय तक शारीरिक संबंध बनाए और व्यवसाय शुरू करने के नाम पर उससे एटीएम कार्ड, छात्रवृत्ति की राशि, गहने तथा लगभग 15 लाख रुपये ले लिए। छात्रा का आरोप था कि बाद में आरोपी ने शादी से इनकार कर दिया और उसके परिवार ने धमकी देने के साथ जातिसूचक टिप्पणी भी की।
हाईकोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और परिस्थितियों का परीक्षण करते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया यह विवाद मुख्य रूप से आर्थिक और सिविल प्रकृति का प्रतीत होता है। इसी आधार पर अदालत ने आरोपी को सभी आरोपों से राहत प्रदान की।







