उत्तर प्रदेश
सोशल मीडिया पोस्ट और देशद्रोह कानून की व्याख्या को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल किसी दुश्मन देश के समर्थन में नारा या पोस्ट साझा करना अपने आप में देशद्रोह नहीं है, जब तक उससे हिंसा भड़काने या देश की संप्रभुता को वास्तविक खतरा पैदा होने का ठोस प्रमाण न हो।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल की एकलपीठ ने पहलगाम आतंकी हमले के बाद इंस्टाग्राम पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ पोस्ट करने के आरोप में गिरफ्तार फैजान को सशर्त जमानत दे दी। अदालत ने कहा कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के तहत देशद्रोह का अपराध तभी बनता है, जब कृत्य से प्रत्यक्ष रूप से हिंसा या राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा उत्पन्न हो।
यह मामला थाना जलेसर, जिला एटा में बीएनएस की धारा 196(1), 152 और 318(4) के तहत दर्ज किया गया था। अभियोजन के अनुसार, आरोपी ने हमले के तुरंत बाद विवादित पोस्ट साझा की थी और वह 3 मई 2025 से जेल में बंद था।
कोर्ट ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के हालिया निर्णयोंपाकिस्तान जिंदाबाद’ पोस्ट पर इलाहाबाद हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी, सशर्त जमानत मंजूर का हवाला देते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन पर जोर दिया। साथ ही शर्त रखी गई कि आरोपी भविष्य में कोई आपत्तिजनक या देश-विरोधी सामग्री पोस्ट नहीं करेगा। शर्तों के उल्लंघन पर जमानत रद्द की जा सकती है। यह फैसला सोशल मीडिया, अभिव्यक्ति की आज़ादी और देशद्रोह कानून पर चल रही बहस में एक अहम नजीर माना जा रहा है।






