नई दिल्ली
Supreme Court of India ने OBC आरक्षण से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में स्पष्ट किया है कि किसी उम्मीदवार को क्रीमी लेयर में रखने का निर्णय केवल उसके माता-पिता की आय के आधार पर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि इस प्रक्रिया में माता-पिता की नौकरी का पद, सामाजिक स्थिति और सेवा श्रेणी जैसे कारकों को भी ध्यान में रखना जरूरी है।
न्यायमूर्ति P. S. Narasimha और R. Mahadevan की पीठ ने 11 मार्च को दिए अपने फैसले में कहा कि 1993 के कार्यालय ज्ञापन के अनुसार क्रीमी लेयर तय करने के लिए केवल आय नहीं बल्कि पद और सामाजिक स्थिति भी महत्वपूर्ण मानदंड हैं। अदालत ने यह भी कहा कि यदि केवल आय को आधार बनाया जाएगा तो समान स्थिति वाले लोगों के बीच अनुचित भेदभाव पैदा होगा, जो संविधान के समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।
कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2004 के स्पष्टीकरण पत्र की उस व्याख्या पर भी सवाल उठाया जिसमें PSU और निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की वेतन आय को क्रीमी लेयर तय करने का मुख्य आधार माना गया था। अदालत के अनुसार इससे सरकारी कर्मचारियों और निजी या सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों के बच्चों के बीच असमान व्यवहार की स्थिति बनती है।
पीठ ने कहा कि क्रीमी लेयर को बाहर करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि OBC वर्ग के सामाजिक रूप से आगे बढ़ चुके लोग आरक्षण के लाभ न लें, लेकिन इस प्रक्रिया में समान परिस्थितियों वाले लोगों के साथ अलग-अलग व्यवहार नहीं होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास, केरल और दिल्ली हाई कोर्ट के फैसलों को सही ठहराते हुए केंद्र की अपीलों को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि क्रीमी लेयर तय करते समय आय के साथ-साथ पद और सामाजिक स्थिति का मूल्यांकन भी आवश्यक है।





