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एनसीआर आंदोलन में क्या श्रमिकों की ही गलती हैं आप सभी बुद्धिजीवी विचार करें : एक श्रमिक  

नई दिल्ली

यूं तो हमें बताया जाता है कि मौजूदा संवैधानिक जनतंत्र जनता के लिए जनता का शासन है, लेकिन जब कभी भी देश की जनता का अधिकांश हिस्सा अर्थात् मजदूर/ श्रमिक अपने साथ होने वाले अन्याय के खिलाफ अपने वाकिब हक के लिए जरा सी भी आवाज उठाते हैं, तो तुरंत इस ‘जनता के शासन’ की कलई खुल जाती है । क्योंकि तब पुलिस अफसरशाही और न्यायपालिका सहित इस शासन का पूरा दमनकारी अमला इस मेहनतकश जनता के ऊपर टूट पड़ता है।

दिल्ली के राजधानी क्षेत्र में मानेसर, नोएडा, फरीदाबाद, आदि में बस जिंदा रहने का न्यूनतम अधिकार मांग रहे मजदूरों/ श्रमिकों पर हरियाणा व उत्तर प्रदेश की पुलिस व अदालतों ने जो दमनचक्र छेड़ा है, लाठी-आँसू गैस चलाई है, मजदूरों और मजदूर संगठनों के कार्यकर्ताओं को ही नहीं, उनकी कानूनी मदद करने वाले वकीलों तक को जिस तरह फर्जी आपराधिक इल्ज़ामों में जेल भेजा जा रहा है वो एक बार फिर इस सच्चाई को स्पष्ट कर देता है कि मौजूदा शासन जनता का नहीं, पूंजीपतियों का राज्य है, जो पूंजी के मुनाफे को सुरक्षित रखने के लिए मजदूरों को कुचलने का औजार है।

राज्य में मजदूरों द्वारा गरिमा और मर्यादा से जीना तो दूर ज़िंदा रहने का न्यूनतम अधिकार माँगना भी अपराध बताया जाता है और हिंसा, अव्यवस्था व अराजकता करार दिया गया है! अपने न्यायसंगत अधिकारों के लिए आवाज उठाते मजदूरों से पूंजीपतियों की हिफाजत के लिए पूरा अमला पूरे दलबल के साथ जुट गया है और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री जी तथा डीजीपी द्वारा आंदोलनकारियों को कुचलने की धमकी दी जा रही है। लेकिन मजदूरों का दर्द सुनने वाला कोई नहीं। एनसीआर एरिया में 10 घंटे के लिए ₹10,000 पाने वाला श्रमिक कैसे अपना और परिवार का पालन कर सकता है यह एक विचारणीय प्रश्न है। लेकिन इस दर्द को न कोई सुनने वाला और न कोई इस गंभीरतापूर्वक विचार करने वाला है।

आज खाद्य सामग्री से लेकर सभी जरूरी चीजों के दामों में महंगाई आसमान पर है। सरकारी संरक्षण में जमाखोर-मुनाफ़ाख़ोर 60 रू किलो वाली एलपीजी के लिए प्रवासी मजदूरों से 400 रू तक वसूल रहे हैं। मकान भाड़ा, स्कूली फीस, इलाज, आदि पर महंगाई औसत 10% से भी ऊपर है। तब 12-16 घंटे और रविवार तक को काम कर मजदूरों को 9 से 12 हज़ार रू औसत मजदूरी मिल रही है। सैलरी स्लिप तक नहीं दी जाती। 10-15 साल काम करने पर भी पक्की नौकरी नहीं की जाती। काटा गया पीएफ-ईएसआई तक का पैसा सेठ चोरी कर लेते हैं। कैंटीन सुविधा नहीं दी जाती। कहीं मिलती है तो मैनेजरों को मिलने वाले अच्छे खाने के बजाय सड़ा खाना दिया जाता है। मजदूरों के साथ जानवरोन की तरह व्यवहार किया जाता है। जरूरी सुरक्षा इंतजामों के अभाव में देश में हर साल औसत 48 हज़ार कामगार कार्यस्थल के ‘हादसों’ में जान गंवाते हैं और किसी भी पूंजीपति और मिल मलिक को को इस हिंसा-अपराध में कोई सजा नहीं होती।

हरियाणा सरकार ने 10 साल बाद इस आंदोलन के दबाव में न्यूनतम मजदूरी बढ़ाकर 15,220 रू की है, जो जीवन चलाने के लिए पूरी तरह नाकाफ़ी है। इसे कम बताते हुए मजदूर अगर 20 हज़ार रू महीना मजदूरी भी मांग रहे हैं, तो वह भी कम ही है। सरकार के अपने वेतन आयोगों के बनाये गए न्यूनतम जीवन के आधारों से हिसाब लगायें तो आज 30 हज़ार रू न्यूनतम मजदूरी की माँग पूरी तरह वाजिब है। मजदूरों की मांग में नावाजिब जैसा कुछ भी नहीं है, क्योंकि अपने ख़ून पसीने की मेहनत से सब कुछ पैदा करने वाले मजदूरों को इतनी कम मजदूरी देकर ही चंद पूंजीपतियों ने इतने ऊँचे सुपर मुनाफे लूटे हैं कि आज वे पूरे देश की 80% से अधिक संपत्ति के मालिक बन बैठे हैं। अंबानी, अदानी, टाटा जैसे बड़े पूँजीपतियों के मुनाफे पिछले 6 सालों में 5 गुना बढ़ गए हैं। उधर अपने श्रम से सारा उत्पादन करने वाले श्रमिक कंगाली और भुखमरी की स्थिति में पहुंच गए है।

चुनांचे 23 फ़रवरी को पानीपत रिफाइनरी से शुरू हो पूरे देश में फैला और दिल्ली राजधानी क्षेत्र में चल रहा मजदूरों का संघर्ष पूरी तरह वाजिब और न्यायसंगत है। सिर्फ़ मजदूरों-मेहनतकशों को ही नहीं, देश के सभी जनवाद और इंसाफ़ पसन्द लोगों को इसके साथ मजबूत एकजुटता का प्रदर्शन करना चाहिए। मजदूरों पर दमन, विरोध को दबाना और सभी को गिरफ्तार करना इस समस्या का हल नहीं है। कांग्रेस सरकारों की तरह दमन में 5 कदम आगे बढ़कर कोई भी सरकार इस समस्या का हल नहीं कर सकती है। इसलिए सरकार श्रमिकों का प्रतिनिधिमंडल बुलाकर पहले उनका दर्द सुने। फिर उस पर विचार करें। साथ ही

कार्यकर्ताओं की तुरंत रिहाई की जानी चाहिए। सभी मजदूर संगठनों को इस मजदूर संघर्ष को संगठित रूप देने हेतु फौरी व्यापक एकता बनाकर संयुक्त कार्रवाई करनी चाहिए।

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