नई दिल्ली
दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर करीब तीन दशक से बर्फ में दबे एक शव को अब भारत वापस लाने की तैयारी की जा रही है। लंबे समय से इस शव की पहचान पर्वतारोही त्सेवांग पालजोर के रूप में होती रही थी, लेकिन नए साक्ष्यों के सामने आने के बाद अधिकारियों का मानना है कि यह अवशेष लद्दाख निवासी आईटीबीपी के जवान लांस नायक दोरजे मोरुप के हैं।
दोरजे मोरुप वर्ष 1996 में एवरेस्ट के उत्तरी यानी तिब्बती मार्ग से चढ़ाई करने वाले भारत के पहले अभियान दल में शामिल थे। चढ़ाई के दौरान उनकी मौत हो गई थी और शव वहीं बर्फ में दबा रह गया। पैरों में हरे रंग के जूते होने के कारण उनका शव पर्वतारोहियों के बीच ‘ग्रीन बूट्स’ के नाम से चर्चित हो गया। कई वर्षों तक यह शव एवरेस्ट पर चढ़ने वाले पर्वतारोहियों के लिए एक प्रमुख पहचान-चिह्न बना रहा।
वर्ष 2024 में अभियान से जीवित लौटे सदस्यों की गवाही और मोरुप के अंतिम रेडियो संपर्क से जुड़ी जानकारी सामने आने के बाद शव की पहचान को लेकर नए सिरे से जांच की गई। इसके बाद अधिकारियों ने इसे दोरजे मोरुप के अवशेष होने की संभावना जताई है।
लद्दाख के स्कुरबुचन गांव निवासी मोरुप वर्ष 1969 में आईटीबीपी में भर्ती हुए थे। अभियान पर जाने से पहले उन्होंने पत्नी कोंचक यांग्सकित से बच्चों का ख्याल रखने और लौटने पर एयरपोर्ट आने की बात कही थी। करीब 75 वर्षीय उनकी पत्नी और परिवार अब वर्षों बाद उनके अवशेष वापस मिलने की उम्मीद लगाए बैठे हैं। भारत शव को एवरेस्ट से सुरक्षित नीचे लाने के लिए रेस्क्यू दल की तलाश कर रहा है।





